परिणाम आधारित और विज्ञान सम्मत्त है वास्तुशास्त्र

लोग अक्सर पूछते हैं कि जो भाग्य में लिखा है वही होना है तो फिर वास्तुशास्त्र का पालन करने या नहीं करने से क्या फर्क पड़ जायेगा. वास्तविकता यह है कि प्रारब्द्ध को बदला नहीं जा सकता परन्तु वास्तुशास्त्र की अनुकूलता या प्रतिकूलता परिस्थितियों और घटनाओं के प्रभाव को घटा या बढ़ा देती है. उदाहरणार्थ यदि किसी का घर या व्यावसायिक परिसर वास्तुनुरुप बना हुआ है पर ज्योतिषीय दृष्टि से समय सही नहीं है तो परिणाम नकारात्मक ही होंगे परन्तु भवन की वास्तुनुरुपता बुरे परिणामों की मात्रा में  उल्लेखनीय कमी अवश्य करेगी. इसी प्रकार से यदि किसी का घर या व्यावसायिक परिसर वास्तु नियमों के विपरीत बना हुआ है पर ज्योतिषीय दृष्टि से समय सही है तो परिणाम सकारात्मक ही होंगे परन्तु भवन में वास्तुदोष होने से अच्छे परिणाम अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाएंगे. कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता है कि कोई व्यक्ति अचानक ही सफलता के शिखर या असफलता के गर्त को छूने लगता है. इसका कारण यह है कि या तो वास्तुनुरुप बने हुए मकान में रहने वाले व्यक्ति का समय भी अच्छा आ जाने से सदपरिणामों की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है या फिर वास्तु दोषों से युक्त भवन में निवास या व्यवसाय करने वाले व्यक्ति का समय भी प्रतिकूल आ जाने से नकारात्मक परिणामों की गंभीरता में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है. वास्तुशास्त्र एक परिणाम आधारित (रिज़ल्ट ओरिएंटेड) विज्ञान है. वास्तु को नहीं मानने वाले लोग प्रायः वास्तु के बारे में कुछ भी नहीं जानते अन्यथा यह इतना विज्ञान सम्मत्त है कि कोई इसको माने बिना नहीं रह सकता. सुनी सुनाई भ्रांतियों या पूर्वाग्रहों के आधार पर वास्तुशास्त्र को नकारने के बजाय यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि आधुनिक विज्ञान वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों पर अनुसन्धान करके किस निष्कर्ष पर पहुँचा है. हजारों वर्षों से भारतीय वास्तुशास्त्र यह कहता आया है कि भवन के वास्तुनुरुप होने से ही जीव के साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो पाता है जिससे उसको सुकून मिलता है परन्तु दुनिया ने इस बात को १९७० में जाकर तभी माना जब डॉ. अर्नेस्ट हर्टमन ने अनुसंधान करके पुष्टि की कि पृथ्वी की सतह से उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की ओर उर्जा रेखाएं उभरती हैं जिन्हें उन्होंने बीईएम (बायो इलेक्ट्रो मेग्नेटिक फील्ड) का नाम दिया और प्रमाणित किया कि किसी भी जीव के शरीर की कोशिका अपनी स्वयं की वायब्रेटरी फंडामेंटल फ्रीक्वेंसी के कारण एक रेडियो रिसीवर की भांति कार्य करती है और वह बीईएम से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती. वास्तुनुरुप निर्माण की स्थिति में भवन का बीईएम पूर्णरूप से संतुलित रहता है तथा निवास करने वाले की कोशिकाओं का बीईएम से सामंजस्य रहने के कारण वह सुकून और शांति का अनुभव करता है.

One Person has left comments on this post



» anand vyas said: { Apr 13, 2011 - 07:04:12 }

Sir
i agree with ur thought