GOD’S MILL GRINDS SLOW BUT SURE !

Posted on December 4th, 2010 by R K Sutar

People often ask if it is pre fixed that what is to be happened is happened then what does it make difference of obeying or not obeying the rules of vastushastra .It’s true that we can’t change our fortune but the favorable or unfavorable conditions of vastushastra has the power to enhance or reduce the effects of other incidents. For example if someone’s home or commercial complex is constructed according to vastushastra but if his (person’s) stars are not favorable according to astrological point of view then definitely the results would be negative but at the same time coincidence of building according to vastu will certainly decrease the magnitude of bad/negative results notably. Similarly if someone’s home or commercial complex is not constructed according to vastu rules but if it’s proper good time astrologically then certainly the results would be positive but due to the vastu defects may not be in expected amounts. Sometimes it’s also seen that someone touches the apex of success very suddenly or vice versa. The reason behind it may be that either that person has good stars position living in that building which matches the rules of vastushastra resulting the favorable consequences in many times or on the other hand to live or run the business in that building which doesn’t fulfill the vastu rules plays an important role to increase the magnitude of adverse effects matching with the unfavorable stars position of that particular person. Actually vastushastra is a result oriented science .In fact the people who don’t believe in vastu they really don’t know the ABC of vastu (don’t have any idea about It.) otherwise vastu is so agreeable science that no one can deny its utility. Instead of avoiding the vastushastra on the basis of only hearsay misconceptions or prejudices we should try to know what are the findings of modern science based on the principles of vastushastra. The Indian vastushastra has always been saying it for thousands of years that the human being identity is only possible merely having the building according to the vastu which then provides him peace of mind. But it was 1970 when this world accept this fact when Dr. Earnest Hartman confirmed it by his research that energy waves/lines appear from north to south and east to west from the surface of the earth and he called them BEM (Bio Electro Magnetic Field) and proved that cell of any organisms works like a radio receiver by the vibratory fundamental frequency produced by itself and it (cell) can’t be lived without being effected. A building has a well –balanced BEM when it is constructed under the vastu rules and thus cells of resident have good co ordination with BEM (of building) and so they make resident feel comfort and peace of mind !

परिणाम आधारित और विज्ञान सम्मत्त है वास्तुशास्त्र

Posted on November 3rd, 2010 by R K Sutar

लोग अक्सर पूछते हैं कि जो भाग्य में लिखा है वही होना है तो फिर वास्तुशास्त्र का पालन करने या नहीं करने से क्या फर्क पड़ जायेगा. वास्तविकता यह है कि प्रारब्द्ध को बदला नहीं जा सकता परन्तु वास्तुशास्त्र की अनुकूलता या प्रतिकूलता परिस्थितियों और घटनाओं के प्रभाव को घटा या बढ़ा देती है. उदाहरणार्थ यदि किसी का घर या व्यावसायिक परिसर वास्तुनुरुप बना हुआ है पर ज्योतिषीय दृष्टि से समय सही नहीं है तो परिणाम नकारात्मक ही होंगे परन्तु भवन की वास्तुनुरुपता बुरे परिणामों की मात्रा में  उल्लेखनीय कमी अवश्य करेगी. इसी प्रकार से यदि किसी का घर या व्यावसायिक परिसर वास्तु नियमों के विपरीत बना हुआ है पर ज्योतिषीय दृष्टि से समय सही है तो परिणाम सकारात्मक ही होंगे परन्तु भवन में वास्तुदोष होने से अच्छे परिणाम अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाएंगे. कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता है कि कोई व्यक्ति अचानक ही सफलता के शिखर या असफलता के गर्त को छूने लगता है. इसका कारण यह है कि या तो वास्तुनुरुप बने हुए मकान में रहने वाले व्यक्ति का समय भी अच्छा आ जाने से सदपरिणामों की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है या फिर वास्तु दोषों से युक्त भवन में निवास या व्यवसाय करने वाले व्यक्ति का समय भी प्रतिकूल आ जाने से नकारात्मक परिणामों की गंभीरता में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है. वास्तुशास्त्र एक परिणाम आधारित (रिज़ल्ट ओरिएंटेड) विज्ञान है. वास्तु को नहीं मानने वाले लोग प्रायः वास्तु के बारे में कुछ भी नहीं जानते अन्यथा यह इतना विज्ञान सम्मत्त है कि कोई इसको माने बिना नहीं रह सकता. सुनी सुनाई भ्रांतियों या पूर्वाग्रहों के आधार पर वास्तुशास्त्र को नकारने के बजाय यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि आधुनिक विज्ञान वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों पर अनुसन्धान करके किस निष्कर्ष पर पहुँचा है. हजारों वर्षों से भारतीय वास्तुशास्त्र यह कहता आया है कि भवन के वास्तुनुरुप होने से ही जीव के साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो पाता है जिससे उसको सुकून मिलता है परन्तु दुनिया ने इस बात को १९७० में जाकर तभी माना जब डॉ. अर्नेस्ट हर्टमन ने अनुसंधान करके पुष्टि की कि पृथ्वी की सतह से उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की ओर उर्जा रेखाएं उभरती हैं जिन्हें उन्होंने बीईएम (बायो इलेक्ट्रो मेग्नेटिक फील्ड) का नाम दिया और प्रमाणित किया कि किसी भी जीव के शरीर की कोशिका अपनी स्वयं की वायब्रेटरी फंडामेंटल फ्रीक्वेंसी के कारण एक रेडियो रिसीवर की भांति कार्य करती है और वह बीईएम से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती. वास्तुनुरुप निर्माण की स्थिति में भवन का बीईएम पूर्णरूप से संतुलित रहता है तथा निवास करने वाले की कोशिकाओं का बीईएम से सामंजस्य रहने के कारण वह सुकून और शांति का अनुभव करता है.

भारत की अनुपम देन है वास्तुशास्त्र

Posted on August 17th, 2010 by R K Sutar

हजारों वर्ष पूर्व भारतीय ऋषि-मनीषियों के व्यापक अनुसन्धान से सृजित वास्तुशास्त्र प्राचीनतम उपलब्ध विज्ञानों में से एक है तथा पूरे विश्व को भारत की एक अनुपम देन है जो जाति, धर्म और देश की सीमाओं से उठकर मानवमात्र का कल्याण करने को कटिबद्ध है. आधुनिक आर्किटेक्चरल विज्ञान किसी भी भवन को सुन्दर और सुविधाजनक बनाने में तो सक्षम है किन्तु उस भवन में निवास या व्यवसाय करने वाले लोगों के सुखपूर्वक जीवनयापन की गारंटी केवल भारतीय वास्तुशास्त्र ही देता है. वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने का जितना महत्व है उतना ही महत्व वास्तुशास्त्र के विभिन्न नियमों के सम्बन्ध में व्याप्त भ्रांतियों से बचने का भी है. कई लोग वास्तु के नियमों की जानकारी होने पर भी उनके क्रियान्वयन के सही तरीकों का पता नहीं होने के कारण जीवन भर एक्सपेरिमेंट्स करते हुए दुखों का सामना करते रहते हैं. उदाहरणार्थ अधिकांश लोग आज भी उप-दिशाओं अर्थात ईशान, वायव्य, आग्नेय और नैरूत को सदैव ही भवन अथवा प्लाट के कोनों में ही स्थित मानकर चलते हैं जबकि ऐसा हमेशा नहीं होता. परिणामतः अनजाने में ही वास्तु नियमों का उल्लंघन हो जाने से सुख प्राप्ति के स्थान पर जीवन कष्टों से घिर जाता है. दरअसल वास्तु विज्ञान में गणना और आंकलन का आधार चुम्बकीय उत्तर (मेग्नेटिक नोर्थ) होता है जबकि प्रायः लोग भौगोलिक उत्तर अर्थात सूर्योदय को वास्तु परीक्षण का आधार बना लेते हैं और भूल जाते हैं कि दक्षिणायन और उत्तरायण में सूर्य उगने की दिशा में तो पर्याप्त अंतर आ जाता है. नियमों का पालन और परिणामों की सटीकता का सीधा सम्बन्ध केवल चुम्बकीय उत्तर से है. किसी भी भूखंड विशेष से मेग्नेटिक नोर्थ का कितने डिग्री विक्षेप है, उसकी जानकारी करके एवं तदनुरूप ही अष्ट दिशाओं के व्याप क्षेत्र की गणना करके ही वास्तु का सम्पूर्ण लाभ लेना संभव है. केवल वास्तुनुरुप नक्शा बनवाना ही पर्याप्त नहीं होता वरन भूखंड के चयन, सेटबेक, नक्शा, निर्माण प्रक्रिया, आतंरिक सज्जा, एलिवेशन, रंग योजना इत्यादि का भी वास्तुनुरुप होना आवश्यक है. विवाह और गृह निर्माण किसी भी व्यक्ति के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले कारक होते हैं. अतः घर को नीम-हकीमों के हवाले नहीं करना चाहिए. वास्तुशास्त्र अच्छे समय में आपके लाभ को दुगुना और बुरे समय में हानि को आधा करने में सक्षम है. एक ओर हमारे ही देश के कई लोग अभी भी वास्तुशास्त्र की विश्वसनीयता को संदेह की दृष्टि से देखते हैं जबकि पूरी दुनिया में धूम मचाने वाले वास्तुशास्त्र की वैज्ञानिकता को आधुनिक विज्ञान और पाश्चात्य जगत नमन कर रहा है.

Vastu Shastra: The Great Ancient Science

Posted on August 17th, 2010 by R K Sutar

Vastushastra is one of the sciences available & created by great Indian Rishi-munis (saints) after the wide research of thousands of years. It is a unique gift of India to world which is beyond castes, religions and boundaries of country and committed to the welfare of mere mankind. Although modern architecture is able to make any mansion nice and comfortable, but it is Indian vastushastra which provides guarantee of leading a peaceful life to the residents or industrialists of that building. To obey the guide lines/rules of vastushastra are equally important as to be on safe line from the misconceptions penetrates in various rules of vastushastra. In spite of having quite knowledge of vastu rules many a people keep facing grief and sorrow by doing experiments with all the life long just because of the lack of right methods of execution. For example, most of the people still assume that sub directions as Eshan, Vayavya, Aagnaya and Neritya are always situated at the corners of a plot or building but it is not always true and life is got into hot water in spite of getting contentment just because of the violation of vastu’s rules. Actually in vastushastra calculation and assessments are based on magnetic North whereas in general, people take geographical north namely sunrise is the base for the vastu test and this time they probably forget that quite difference in direction of sun rising takes place from dakshiyayan to uttarayan.
The perfection of  results and obey of rules are directly correlated to only magnetic North.After getting the knowledge of how much degree of North magnetic from a specific plot is fluctuated and according to that calculating the occupied area of eight directions, the whole advantage of vastu shastra is only possible. Drafting of map according to vastu is not only enough but selection of plot, setback, map, construction process, interior decoration, elevation, colours scheme  etc should also be matched to vastushastra. Wedding and house construction are the most affecting factors in someone’s life. So a sweet home can’t be given in the hands of quacks ! Vastushastra has the power to make your profit double during good time and can reduce the amount of loss up to half in rainy days.
On the other hand some people of even our country have suspected eye towards the reliability of vastushastra whereas scientifically proved and causing commotion in all over the world such vastushastra is getting salute of western world as well as modern science.